गौरव
लाइव भारत न्यूज़
नई दिल्ली।
07 मार्च 2019
सत्ता गंवाने के कुछ ही महीनों बाद भारतीय जनता पार्टी के तीन पूर्व मुख्यमंत्री पराजय से उपजे तिरस्कार और पार्टी की भीतरी प्रतिस्पर्धा से दोचार हो रहे हैं.
अब पता यह चल रहा है कि 11 दिसंबर को आए जिन चुनाव नतीजों ने शिवराज सिंह चौहान को मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री की कुर्सी से बेदखल कर दिया था, वे उन सियासी झटकों की शुरुआत भर थे जो भारतीय जनता पार्टी के इस दिग्गज नेता का इंतजार कर रहे थे.
जनादेश के दो दिन के भीतर चौहान ने ऐलान कर दिया कि वे कहीं नहीं जा रहे हैं और प्रदेश की राजनीति में बने रहेंगे. उन्होंने कहा कि वे जल्द ही पूरे राज्य की ‘आभार यात्रा’ पर निकलेंगे. पर उनके इस मंसूबे पर जल्दी ही पानी फिर गया जब केंद्रीय नेतृत्व ने उनसे इसे तिलांजलि देने के लिए कह दिया. फिर खबर आई कि वे विपक्ष का नेता बनने के लिए तैयार हैं. यह ओहदा आखिरकार पूर्व मंत्री गोपाल भार्गव (जो उनके करीबी नहीं माने जाते) की झोली में चला गया.
फिर चैहान ने भाजपा प्रदेश अध्यक्ष बनने में दिलचस्पी दिखाई. मगर दिल्ली में राष्ट्रीय कार्यकारिणी की बैठक के एक दिन पहले चौहान यह देखकर हैरान रह गए कि उन्हें दूसरे दो राज्यों के चुनाव हार चुके पूर्व मुख्यमंत्रियों—यानी राजस्थान की वसुंधरा राजे और छत्तीसगढ़ के रमन सिंह—के साथ राष्ट्रीय उपाध्यक्ष बना दिया गया है.
केंद्रीय नेतृत्व की तरफ से संदेश साफ थाः चौहान अब और अपना मनचाहा हासिल नहीं कर सकेंगे. चौहान ने मुख्यमंत्री के तौर पर 13 साल तक बेधड़क राज किया था और इस दौरान कई उभरते सियासी प्रतिद्वंद्वियों का कद छोटा करने में कामयाब रहे थे. पर अब प्रतिद्वंद्वी उनके खिलाफ गोलबंद हो रहे हैं और हर मोड़ पर उन्हें मात दे रहे हैं. चौहान इस चक्रव्यूह से भला कैसे निकलेंगे?
सूबे के सियासी जानकार मानते हैं कि चौहान के खिलाफ तलवारें म्यान से बाहर आ गई हैं. सबको पता है कि प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री भाजपा के मौजूदा केंद्रीय नेतृत्व नरेंद्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी के पसंदीदा नहीं हैं.
चौहान ने उन्हें करीब-करीब भरोसा दिला दिया था कि चुनाव से पहले वही उनके लिए सबसे उम्दा दांव हैं. मगर अब वे सियासी तौर पर नजरों से उतर चुके लगते हैं—बावजूद इसके कि मध्य प्रदेश में पार्टी ने बेहतरीन प्रदर्शन किया, जिसमें उसने कांग्रेस से वाकई कहीं ज्यादा वोट हासिल किए और 230 सदस्यों की विधानसभा में कांग्रेस की 114 सीटों के मुकाबले 109 सीटों के साथ बेहद मामूली अंतर से बहुमत हासिल करने से चूक गई.
विकल्प उनके सामने कम ही हैः वे लोकसभा का चुनाव लड़ सकते हैं और अगर भाजपा फिर जीतकर केंद्र में सरकार बनाती है तो मंत्री बनकर प्रासंगिक बने रह सकते हैं (आरएसएस के साथ उनके अच्छे रिश्ते यह पक्का कर सकते हैं). दूसरा विकल्प यह होगा कि वे राज्य की सियासत में ही रहें और कांग्रेस के बहुत मामूली बहुमत को देखते हुए उसकी सरकार को अस्थिर करने की कोशिश करें. अगर वे इसमें कामयाब रहते हैं तो फिर मुख्यमंत्री का ओहदा हासिल कर सकते हैं लेकिन यह आसान नहीं होगा. ऐसा करने वाले को कमल नाथ और दिग्विजय सरीखे दिग्गज नेताओं का मुकाबला करना होगा जो इस खेल के पुराने उस्ताद हैं.
चौहान के सामने तीसरा विकल्प यह है कि वे अगले चुनावों में, फिर वे चाहे जब भी हों, भाजपा के लिए मध्य प्रदेश फतह करने के लिए काम करें. इसमें उन्होंने दिलचस्पी जाहिर भी की है. इसके लिए कड़ी मेहनत करनी होगी, ढेरों यात्राएं करनी होंगी और लोगों से मिलना पड़ेगा. मगर शिवराज सिंह चौहान सबसे ज्यादा इसी काम के लिए उत्सुक हैं क्योंकि यह सब वे बहुत सहजता से कर पाते हैं.
वे सत्ता से बाहर भले हों, पर लोगों के दिलो-दिमाग में बने रहने का उनका इरादा पक्का है और लगातार यात्राएं प्रासंगिक बने रहने की उनकी कोशिशों का ही हिस्सा हैं. मगर कभी-कभी मंसूबे उलटे पड़ जाते हैं. 18 जनवरी को ऐसा ही हुआ जब चौहान स्थानीय नगरपालिका के अध्यक्ष प्रह्लाद बंधवार की हत्या का विरोध करने और राज्य में कानून-व्यवस्था के ध्वस्त हो जाने के खिलाफ कांग्रेस सरकार पर हमला बोलने के लिए आनन-फानन मंदसौर के लिए निकल पड़े—तभी बीच रास्ते में उन्हें पता चला कि आरोपी उनकी अपनी पार्टी का नेता है.
इस बीच उन्हें खुद अपनी पार्टी के भीतर से चुनौती का सामना करना पड़ रहा है. कभी उनके साथी रहे केंद्रीय मंत्री नरेंद्र सिंह तोमर, राज्य सरकार में पूर्व मंत्री नरोत्तम मिश्र, भाजपा महासचिव कैलाश विजयवर्गीय, राज्य अध्यक्ष राकेश सिंह, सबसे बढ़कर उपाध्यक्ष प्रभात झा, इन सबको चौहान को बाहर रखने का साझा एजेंडा मिल गया लगता है. एक और घटना जो बहुत-कुछ कहती है, यह है कि चौहान के जनसंपर्क और प्रेस नोट का काम अब एक अलग टीम संभाल रही है और राज्य भाजपा दफ्तर से उस टीम का कोई लेना-देना नहीं है.
सत्ता से बाहर रहकर प्रासंगिक बने रहना ज्यादातर नेताओं के लिए जबरदस्त चुनौती होती है. आगामी लोकसभा चुनाव के नतीजे बेहद अहम होंगे. यह बात पार्टी के केंद्रीय नेतृत्व और उसके फैसलों से प्रभावित होने वालों, दोनों को अच्छी तरह पता है.
भाजपा की अकेली उम्मीद अभी तक यही है कि अगुआई की कमान नए हाथों में सौंपने के साथ ही वसुंधरा राजे के खिलाफ सत्ता विरोधी भावना लोकसभा चुनावों तक छूमंतर हो जाएगी. यही नहीं, भाजपा के पास इसकी कोई योजना नहीं है कि राजस्थान की पूर्व मुख्यमंत्री का इस्तेमाल कैसे किया जाए.
राजे ने 10 फरवरी को कहा कि भले ही उन्हें पार्टी का उपाध्यक्ष बना दिया गया है, पर वे राज्य को छोड़कर नहीं जाएंगी. वे अपने निर्वाचन क्षेत्र झालरापाटन में पार्टी कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रही थीं. यह झालावाड़-बरन संसदीय क्षेत्र में आता है, जहां से उनके बेटे दुष्यंत सिंह तीन बार से सांसद हैं और इस बार भी उनके चुनाव लडऩे की उम्मीद की जा रही है. चर्चा है कि राजे से आम चुनाव लडऩे के लिए कहा जाएगा ताकि उन्हें राज्य की सियासत से बाहर निकाला जा सके, पर उन्होंने अपनी ओर से ऐसी अफवाहों को खारिज करने की भरपूर कोशिश की है.
राजे अपने बेटे के निर्वाचन क्षेत्र का दौरा करती रही हैं और उन्होंने एक किस्म से चुनाव प्रचार भी शुरू कर दिया है. उन्होंने स्वाइन फ्लू को जिसने 100 लोगों की जिंदगी लील ली और शीतलहर के चलते 10 किसानों की मौत को लेकर (पूर्व मुख्यमंत्री का आरोप है कि ये मौतें इसलिए हुईं क्योंकि सरकार ने खेतों में सिंचाई के लिए बिजली रात में दी जब तापमान में अच्छी-खासी गिरावट आ गई थी) नई कांग्रेस सरकार पर हमला बोला.
कयास हैं कि पार्टी राजे को लोकसभा चुनाव लड़वाना चाहती है. इसका मतलब यह होगा कि दुष्यंत को टिकट से हाथ धोना पड़ सकता है. एक और धड़ा मानता है कि अगर भाजपा लोकसभा का चुनाव जीतती है तो राजे को केंद्र सरकार में शामिल होने के लिए कहा जा सकता है. इसकी ज्यादा संभावना नजर आती है, खासकर तब जब सुषमा स्वराज, अरुण जेटली और मनोहर पर्रीकर सरीखे बड़े मंत्रियों की सेहत बहुत अच्छी नहीं चल रही है. मगर राजे अपने बेटे दुष्यंत को मंत्री बनाने पर जोर दे सकती हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछली बार खुद उनके मुख्यमंत्री होने के चलते उनकी इस इच्छा को ठुकरा दिया था.
तो भाजपा राजे का इस्तेमाल भला कैसे कर सकती है? चुनावी हार के बाद पार्टी ने अभी तक उन्हें नेपथ्य तक सीमित रखने की कोशिश की है. उनके प्रतिद्वंद्वी और आरएसएस के पंसदीदा गुलाबचंद कटारिया विपक्ष के नेता हैं. वे जैन समुदाय से आते हैं और आठ बार के विधायक हैं. वहीं सात बार के विधायक और राजपूत समुदाय से आने वाले राजेंद्र राठौड़ विपक्ष के उपनेता हैं. दोनों राज्य में लंबे वक्त तक मंत्री रहे हैं, पर अपनी जाति के लोगों पर उनका असर सीमित ही है. राजे से नजदीकी के चलते राठौड़ कभी आरएसएस के निशाने पर हुआ करते थे. बताया जाता है कि हाल के दिनों में वे संघ और राजे विरोधी लॉबियों के साथ रिश्ते सुधारने का जतन करते रहे हैं.
पिछले हफ्ते उनके हाथों नेता विपक्ष के लिए कटारिया के नाम की पेशकश किए जाने से पहले भाजपा के 73 में से 54 विधायक राजे से विपक्ष का नेता बनने की गुजारिश करने के लिए उनके घर पर जमा हुए थे. राठौड़ और कटारिया दोनों को फर्जी मुठभेड़ों में हत्या की वजह से मुकदमों का सामना करना पड़ा है. कटारिया के खिलाफ सोहराबुद्दीन एनकाउंटर केस में (जिसमें एक वक्त गुजरात पुलिस और पार्टी अध्यक्ष शाह भी आरोपी थे) मुकदमा दर्ज किया गया था, जबकि राठौड़ को 2006 में शराब तस्कर दारा सिंह की मौत के मामले में एक महीने जेल में रहना पड़ा था. बाद में दोनों बरी हो गए.


राजस्थान में भाजपा का मंसूबा ‘कमजोर पड़ गए’ संगठन को मजबूत बनाने का है. प्रदेश अध्यक्ष 74 वर्षीय मदनलाल सैनी की तैनाती विधाससभा चुनावों से पहले की गई थी क्योंकि वे बिल्कुल जमीन से जुड़े कार्यकर्ता थे. उस वक्त भी थोड़ी खींचतान हुई थी क्योंकि राजे ने केंद्रीय राज्यमंत्री और इस ओहदे के लिए मोदी की पसंद 51 वर्षीय गजेंद्र सिंह शेखावत को राज्य अध्यक्ष नहीं बनने दिया था. अब जब राठौड़ विपक्ष के उपनेता हैं, पार्टी शेखावत को राज्य अध्यक्ष के पद पर नहीं ला सकेगी क्योंकि लोकसभा चुनाव काफी नजदीक हैं.
केंद्रीय राज्यमंत्री राज्यवर्धन राठौड़ राज्य में भाजपा के एक और लोकप्रिय नेता हैं और उनके साथी जनरल वी.के. सिंह भी (दोनों राजूपत), पर भाजपा के पास दुष्यंत सिंह के अलावा कोई प्रमुख जाट चेहरा नहीं है. राजे खुद राजपूत हैं, उनकी शादी एक जाट से हुई थी और उनकी बहू गुर्जर है—इस कारण उन्हें जातिगत समीकरणों से ऊपर माना जा सकता है. चुनावों के नजदीक आने के साथ भाजपा को मतदाताओं पर उनके असर और विधायकों पर उनकी पकड़ को भी ध्यान में रखना ही होगा.
छत्तीसगढ़ भाजपा में तलवारें म्यान से बाहर निकल आई हैं. निशाने पर राज्य के पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह हैं, जिनकी 15 साल से चली आ रही हुकूमत का दिसंबर में कांग्रेस के हाथों भाजपा की जबरदस्त हार के बाद खात्मा हो गया था. 90 सदस्यों की विधानसभा में उनकी पार्टी की सीटों की तादाद पिछले चुनावों की 49 सीटों के मुकाबले घटकर 15 पर आ गई और इसे उनके प्रतिद्वंद्वी सिंह की नीतियों और फैसलों पर जनमत संग्रह करार दे रहे हैं.
रमन के करीबी सूत्रों का कहना है कि हार के बाद भी उनके साथ पार्टी का रवैया उतना सख्त नहीं है जितना मध्य प्रदेश में शिवराज सिंह चौहान के साथ रहा है. वे दावा करते हैं कि राज्य भाजपा अध्यक्ष धरमलाल कौशिक को उन्हीं के कहने पर विपक्ष का नेता बनाया गया है और लोकसभा चुनाव से पहले जब नए राज्य अध्यक्ष की नियुक्ति की जाएगी तब भी उन्हीं की सुनी जाएगी.
चौहान जहां मध्य प्रदेश का दौरा कर रहे हैं, वहीं उनके उलट रमन आराम की मुद्रा में हैं. उनके एक सहयोगी दावा करते हैं, ”ऐसा इसलिए है क्योंकि रमन सिंह पदों और ओहदों के पीछे भागने वाले शख्स नहीं हैं.”
चुनाव के बाद रमन दिल्ली जरूर गए थे. भाजपा के केंद्रीय नेतृत्व के साथ उनके न केवल अच्छे रिश्ते हैं बल्कि उन्हें केंद्रीय मंत्री राजनाथ सिंह और अरुण जेटली के करीब भी माना जाता है.
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ में सरकार्यवाह कृष्ण गोपाल के साथ उनके अच्छे समीकरण हैं. मगर जो बात अब भी उनके राजनैतिक भविष्य पर ग्रहण लगा सकती है, वह यह कि प्रदेश भाजपा के भीतर एक धड़े का आकलन यह है कि पार्टी के लिए मजबूत ओबीसी (अन्य पिछड़ा वर्ग) नेतृत्व को आगे बढ़ाना जरूरी है ताकि इन समुदायों में कांग्रेस की लामबंदी को नाकाम किया जा सके.
राज्य में मोटे तौर पर 50 फीसदी मतदाता ओबीसी समुदायों से आते हैं—जिनमें कुर्मी, साहू और यादव समुदाय प्रमुख हैं. भाजपा में यह धारणा इसलिए जोर पकड़ रही है क्योंकि कांग्रेस ने एक कुर्मी नेता मुख्यमंत्री भूपेश बघेल की अगुआई में 68 सीटों पर जीत हासिल की है. एक रुझान पहले ही उभरता दिखाई दे रहा है—नेता विपक्ष बनाए गए कौशिक पिछड़े समुदाय से आते हैं जबकि चंद्रशेखर साहू, जिन्होंने चुनाव से ठीक पहले किसान कर्ज माफी से इनकार करके मुफ्त मोबाइल फोन बांटने के रमन की सरकार के फैसलों की आलोचना की थी, भाजपा के प्रमुख साहू नेता हैं.
बघेल के मीडिया सलाहकार रुचिर गर्ग कहते हैं, ”छत्तीसगढ़ में ओबीसी नेतृत्व थोड़ा भी मजबूत होता है तो यह रमन की कीमत पर ही होगा.” पार्टी के भीतर ओबीसी चेहरे पर जोर दिए जाने से राज्य भाजपा के एक और प्रमुख नेता बृजमोहन अग्रवाल भी खुद को घिरा हुआ पाते हैं.
उधर, बघेल ने पिछली सरकार के दौरान कथित घोटालों की जांच-पड़ताल का आदेश दिया है और पूर्व मुख्यमंत्री को इनकी पूछताछ से भी दोचार होना होगा. जहां रमन ने नई सरकार को कोई भी गड़बड़ी साबित करने की चुनौती दी है, वहीं उनके प्रतिद्वंद्वी उलटे उन्हें परेशानी में डालने की आस लगाए हैं. इससे लड़ाई दिलचस्प मोड़ पर आ गई है.
”ज्यादातर सियासतदानों ने फिर से लोगों के बीच जाने से पहले खुद को थोड़ा वक्त दिया होता, पर चौहान यही करते आ रहे हैं.”

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