गौरव
लाइव भारत न्यूज़
नई दिल्ली।
20 फरवरी 2019
सोलहवीं लोकसभा तीस साल बाद एक दल के बहुमत की सरकार का गवाह बनी.
साल 2014 के संसदीय चुनाव में भाजपा को मिली बड़ी कामयाबी के बाद प्रधानमंत्री मोदी ने मंत्रिपरिषद में कुछ सहयोगी दलों को भी शामिल किया तो लगा कि बहुमत के बावजूद वह संसदीय राजनीति में अपना दायरा व्यापक बनाना चाहते हैं. लेकिन बीते पौने पांच साल के सरकारी और संसदीय कामकाज को देखें तो उसमें व्यापकता के बजाय संकुचन और उदारता के बजाय संकीर्णता नजर आती है.
हमारे समाज और राजनीति में बहुमत और गठबंधन की सरकारों को लेकर हमेशा विवाद रहा है. स्वयं मौजूदा सत्ताधारी दल के नेता दावा करते रहे हैं कि एक दल के बहुमत की सरकार जनता और जनतंत्र के लिए ज्यादा अच्छा काम करती है. गठबंधन सरकारों पर कटाक्ष करते हुए हाल ही में प्रधानमंत्री मोदी ने देश की जनता को ‘महामिलावट की सरकार’ की संभावना से बचने का आह्वान किया था.
ऐसे में आज यह देखना मौजूं होगा कि एक-दल के बहुमत वाली मौजूदा सरकार का कामकाज (गवर्नेंस), संसदीय कार्य, लोकतांत्रिक प्रक्रिया और संवैधानिक संस्थाओं के संरक्षण और सुदृढ़ीकरण के क्षेत्र में कैसा प्रदर्शन रहा? उसने लोकतांत्रिक आदर्शों और संसदीय मूल्यों का कितना निर्वहन किया? संसद और सरकार के बीच कैसा रिश्ता रहा? संसद में विधायी और जन-सरोकार से जुड़े सवालों पर कितना और किस तरह का संवाद हुआ?
कामकाज के घंटों के हिसाब से अगर देखें तो मौजूदा सरकार के कार्यकाल में 16वीं लोकसभा ने 15वीं लोकसभा के मुकाबले ज्यादा समय काम किया. इसकी बैठकों की कुल अवधि 1615 घंटे रही. लेकिन अतीत की कई लोकसभा के मुकाबले ये घंटे काफी कम नजर आते हैं.
एक दल के बहुमत वाली अतीत की अन्य सरकारों के कार्यकाल के दौरान सदन ने औसतन 2689 घंटे काम में बिताए थे. लेकिन काम के इन घंटों से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि एकदलीय बहुमत वाली मौजूदा सरकार ने 16वीं लोकसभा में किस तरह काम किया, किस तरह के कानून बनवाए, संसदीय लोकतंत्र में अहम भूमिका निभाने वाली संसदीय समितियों की क्या सक्रियता रही, संवैधानिकता और लोकतंत्र के प्रति सरकार का क्या नजरिया रहा?
इन सवालों की रोशनी में अगर 16वीं लोकसभा के कार्यकाल का आकलन करते हैं तो सरकार का नज़रिया बहुत निराश और डराने वाला नजर आता है.
लोकसभा के उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक मोदी सरकार ने 16वीं लोकसभा में कुल 133 विधेयक मंजूर कराये. इसमें कुछ महत्वपूर्ण विधेयक हैं जीएसटी विधेयक, आधार सम्बन्धी कानून, महिलाओं के मातृत्व-अवकाश विस्तार का विधेयक और 124वां संविधान संशोधन विधेयक (आर्थिक आधार पर आरक्षण देने का कानून) आदि. निश्चय ही इनमें कुछ अच्छे और सकारात्मक विधेयक भी थे.
लोकसभा ने कुछ ऐसे भी विधेयक मंजूर किये, जिन्हें राज्यसभा की मंजूरी नहीं मिली या जो राज्यसभा में पेश ही नहीं किये जा सके और इस तरह मौजूदा लोकसभा की कार्यावधि के समापन के बाद वे स्वतः खत्म हो गए.
ऐसे विधेयकों की संख्या 46 है, जिनमें नागरिकता कानून और तीन तलाक से सम्बन्धित कानून शामिल हैं. नागरिकता कानून के कुछ बिन्दुओं और तीन तलाक कानून में आपराधिक प्रावधान जोड़े जाने पर प्रमुख विपक्षी दलों में गहरे मतभेद थे.
समाज में भी इन्हें लेकर विवाद था. समूचा पूर्वोत्तर भारत विवादास्पद नागरिकता संशोधन कानून को लेकर आंदोलित था. सत्ताधारी दल के कुछ सहयोगी दलों ने तो अपने आपको उन क्षेत्रीय गठबंधनों से अलग कर लिया, जिसमें भाजपा शामिल थी या जिनका वह नेतृत्व कर रही थी.
सवाल उठता है, ऐसे विवादास्पद और विभेदकारी विधेयकों पर लोकसभा का इतना वक्त क्यों बर्बाद किया गया? सरकार इन्हें सलेक्ट कमेटी या किसी अन्य सम्बद्ध संसदीय समिति में भेजकर सदन और जनप्रतिनिधियों का समय बचाया जा सकता था और समाज को बेवजह के विवाद से भी बचाया जा सकता था.
क्या सरकार ने जानबूझकर ऐसे विधेयकों को लोकसभा में पेश और मंजूर कराया, जिससे वह अपने खास राजनीतिक एजेंडे पर समाज और सियासत में बहस छेड़ सके और इसके जरिये सामुदायिक और सांप्रदायिक ध्रुवीकरण कर सके?
संसदीय मामलों के अध्ययन से जुड़े शोध-संस्थान पीआरएस के शोध के मुताबिक 16वीं लोकसभा में सिर्फ 25 फीसदी विधेयक ही संसदीय समितियों की गहन-पड़ताल (स्क्रूटनी) के लिए भेजे गये. इसका मतलब साफ है कि मौजूदा सरकार ने तकरीबन 75 फीसदी विधेयक आनन-फानन में किसी गंभीर संसदीय पड़ताल के बगैर ही लोकसभा में अपने प्रचंड-बहुमत के बल पर पारित करा लिये.
यह भी एक कारण रहा कि राज्यसभा में ऐसे कई विधेयक लंबे समय तक फंसे रहे या सरकार को ऐसे कुछ विवादास्पद विधेयकों को ‘मनी-बिल’ बनाकर मंजूर कराने का हथकंडा अख्तियार करना पड़ा.
अगर पिछली (15वीं) लोकसभा का आंकड़ा देखें तो 71 फ़ीसदी विधेयक संसदीय समितियों की विशेषज्ञ-पड़ताल के लिए भेजे गये थे. 14वीं लोकसभा में यह आकंड़ा 60 फीसदी रहा.
यह बात सही है कि मौजूदा सरकार ने लोकसभा का ज्यादा वक्त विधायी कार्यों, प्रस्तावों और संकल्पों आदि की प्रस्तुति या मंजूरी मे लगाया. लोकतंत्र में संसदीय सदनों का यह एक अहम कार्य है. लेकिन संवाद और चर्चा के बगैर यह कार्य बेहतर ढंग से संपादित नहीं हो सकता.
लोकतांत्रिक पद्धति वाले दुनिया के सभी प्रमुख देशों के संसदीय कार्य की यही परिपाटी है. स्वयं सत्ताधारी दल के कुछ सांसदों, खासकर पूर्वोत्तर के सदस्यों की राय थी कि नागरिकता कानून जैसे विवादास्पद विधेयकों को पहले सदन की सलेक्ट कमेटी में भेजा जाना चाहिए, तब सदन से मंजूरी लेनी चाहिए. लेकिन सरकार किसी भी महत्वपूर्ण विधेयक को सलेक्ट कमेटी में भेजे जाने से बचती रही.
हाल के वर्षों के सबसे विवादास्पद 124वें संविधान संशोधन विधेयक-2019(आर्थिक आधार पर 10 फ़ीसदी आरक्षण का विधेयक) को भी सरकार ने संसद की सलेक्ट कमेटी में भेजे जाने से साफ़ इंकार कर दिया. कई विपक्षी दलों ने सदन में इस आशय की मांग की पर सरकार ने अपने प्रचंड बहुमत के बल पर असहमति की संजीदा आवाज को दबा दिया.
आनन-फ़ानन में संविधान संशोधन विधेयक पारित कर दिया गया. सरकार ने उक्त विधेयक को जिस जल्दबाजी में जनवरी महीने में दोनों सदनों की मंजूरी दिलाई, वह भारत के संसदीय इतिहास की कुछ अभूतपूर्व घटनाओं में एक है.
लोकसभा ने आठ जनवरी को इसे मंजूर किया और राज्सभा ने नौ जनवरी को. संसद ने अद्भुत और बेमिसाल जल्दबाजी दिखाते हुए संविधान में एक ऐसा संशोधन कर डाला, जिसे बड़े पैमाने पर चुनौती दी गई. सुप्रीम कोर्ट में इस आशय की कई याचिकाएं लंबित हैं.
बीते दो दशकों में यह पहला संविधान संशोधन विधेयक था, जिसमें संसद के दोनों सदनों का सबसे कम वक्त लगा. इसके मुकाबले अतीत का एक उदाहरण देना यहां प्रासंगिक होगा. सन् 1951 में संविधान का पहला संशोधन विधेयक पारित हुआ था. लेकिन संसद में पारित होने से पहले उक्त विधेयक को 20 सदस्यों की एक समिति में गहन पड़ताल और अध्ययन के लिए भेजा गया.
कई दिनों तक उस पर उन सदस्यों के बीच चर्चा हुई. उस पर असहमति के 20 नोट आए. अंततः लंबी बहस और पड़ताल के बाद संविधान के संशोधन का पहला विधेयक संसद में फिर आया और कई लंबी चर्चा के बाद मंजूर हुआ.
इन कुछेक महत्वपूर्ण घटनाक्रमों और उदाहरणों की रोशनी में देखें तो यह बात आईने की तरह साफ है कि मौजूदा सरकार ने अपने बहुमत का इस्तेमाल लोकतांत्रिक संस्थाओं और संसदीय मूल्यों व परम्पराओं को मजबूत करने में नहीं किया. कई मुद्दों पर चर्चा ही नहीं होने दी गई.
कई महत्वपूर्ण विधेयक चर्चा के बगैर पारित करा लिये गये. कतिपय विधेयकों का बेवजह चरित्र बदला गया. राज्यसभा में बहुमत न होने की चुनौती से निपटने के लिए कुछ विधेयकों को मनी-बिल में तब्दील किया गया. सत्तापक्ष ने अपने बहुमत के बल पर अल्पमत और विपक्ष की जरूरी आवाजों को भी दबाने की हरचंद कोशिश की.
रफाल सौदे के मामले में तो सुप्रीम कोर्ट तक में एक महत्वपूर्ण संसदीय समिति के बारे में गलतबयानी की गई कि उक्त समिति को कैग रिपोर्ट मिल चुकी है या कि समिति उससे अवगत है. सच ये है कि कैग-रिपोर्ट बीते 13 फरवरी को संसद में पेश की गई.
16वीं लोकसभा से एक और महत्वपूर्ण बात सामने आती है. भारत जैसे लोकतंत्र में केंद्र-राज्य के रिश्तों और संसदीय प्रक्रिया को भी संघीय ढांचे के अनुरूप विकसित किया जाना चाहिए. अगर राज्यसभा का दलगत समीकरण मौजूदा सरकार के लिए प्रतिकूल नहीं होता तो नागरिकता कानून जैसा बेहद विवादास्पद विधेयक भी संसद की मंजूरी पा लेता. इससे भारत का एक संवेदनशील हिस्सा केंद्र की निरंकुशता से और आहत होता.
अंततः यह देश की एकता और अखंडता के लिए अच्छा नहीं होता. यही कारण था कि आजादी के बाद हमारे संविधान-निर्माताओं ने न केवल राज्यसभा को बरकरार रखने का फैसला किया अपितु उसे ज्यादा प्रतिनिधित्वपूर्ण बनाने की पहल की. बाद के कुछ संवैधानिक संशोधनों के जरिये विभिन्न सरकारों ने राज्यसभा के प्रांतीय-प्रतिनिधित्व के स्वरूप को विकृत करने की कोशिश की, जो संविधान की मूल भावना के विपरीत है.
भारत जैसे विशाल लोकतंत्र में विविधता का सम्मान एक जरूरी राजनीतिक मूल्य है. जिस तरह के आज के संदर्भ में दल-बदल विधेयक के अतिशय पार्टी-पक्षी चरित्र पर पुनर्विचार की जरूरत है, उसी तरह राज्यसभा के प्रांतीय-प्रतिनिधित्व के चरित्र में किये पूर्व के संशोधनों पर भी नये ढंग से विचार की जरूरत है. क्या भविष्य़ की सरकारें लोकतंत्र को मजबूत करने वाले इन कदमों पर विचार करेंगी?

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