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एक बार फिर सड़क से संसद तक आरोपियों को फांसी देने के नारे गुजरने लगे | एक बार फिर लोगों का हुजूम हाथ में मोमबत्ती लेकर सड़क पर चलने लगे| एक बार फिर युवतियों एवं महिलाओं हाथों में तख्तियां लेकर सड़क मार्च करने लगे जिस पर “SAFE ME, WE WANT JUSTICE” जैसे नारे लिखे थे |नेता मंत्री, एक्टर सभी के दुख व्यक्त करने का ताँता लग गया | क्योंकि फिर एक बार हैदराबाद में निर्भया कांड की पुर्नवृति हो गई जिसमें एक 26 वर्षीय महिला पशु चिकित्सक को चार इंसानी भेड़ियों ने अपना शिकार बना कर उसकी जीवन लीला समाप्त कर दिया, बलात्कार के बाद उसे मार कर जला दिया|

हैदराबाद की उस महिला चिकित्सक जो पशुओं की मनोदशा को पढ़ लिया लेकिन इंसानी खाल में भेड़िया को पहचान नहीं पाई |इस जघन्य घटना से सरकार की सारी योजनाओं को हासिए पर ला दिया | इस अपराधी घटना ने “बेटी पढ़ाओ, बेटी बचाओ” जैसे मुहिम को भी ठेंगा दिखा दिया | क्योंकि बेटी पढ़ी लेकिन बेटी बच नहीं पाई | इस तरह के मुहिम ही इस बात को चीख-चीख कर ब्यान करती है की बेटियां सुरक्षित नहीं है |

आज तक एक भी योजना ऐसा नहीं बना जो यह कहे कि “बेटा पढ़ाओ, बेटा बचाओ” |

जन्म से मृत्यु तक सवालों का जवाब सिर्फ बेटियां ही देती है और इस घटना ने पुरुष प्रधान समाज की मानसिकता को दर्शा दिया |

जहां सारे नियम बेटियों पर ही लागू होती है “छोटे कपड़े ना पहनो, किसी पुरुष से दोस्ती ना करो ,शाम तक घर आ जाओ, इतनी देर कहां थी?” इतना ही एक आम आदमी से कोई पूछे जब वह अपनी बेटी की गुमशुदगी की रपट लिखाने थाने जाता है तो वहां पर भी उसे बेतुके सवालों का सामना करना पड़ता है| आखिर इसी तरह के सवाल ही बेटियों के सुरक्षा पर प्रश्न चिन्ह लगा देता है ?

एक सवाल मेरे मन में यह पनपता है कि क्या इस 21वीं सदी के दौर में जब हम चांद पर कदम रख रहे है |तो इस सदी में इस तरह की हिम्मत इन्हें कहां से मिलती है? तो जवाब भी अनायास मिल ही जाता है कि मिल सकती है क्योंकि प्रशासन तंत्र कमजोर है, जो पैसे वालों की जल्दी सुनता और कमजोर को गालीसामना करना पड़ता है | सत्ता के लिए जोड़-तोड़, उंचे सपनों के लिए किसी भी हद तक गिरना, अपनी ड्यूटी को सही तरीके से ना करना इस तरह के जघन्य अपराध के लिए जिम्मेदार है क्योंकि समाज वही सीखता है जो समाज के संचालक करते हैं|


ऐसा लगता है कि लोगों में कानून का खौफ नहीं है, यदि ऐसा होता तो शायद पढ़ने वाली बेटी बच जाती…..

अब समय आ गया है कि इस जघन्य अपराध के लिए एक ऐसी सजा मुकर्रर की जाए जो इतिहास में दर्ज हो जाए और किसी को भी इस तरह के अपराध करने से पहले सोचने पर मजबूर कर दे कि उसके साथ आगे क्या होने वाला है , तभी बेटियां पढ़ भी पाएंगी और बच भी पाएंगी |

लेखक का यह निजी विचार है

सुधीर सिंह

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