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Image result for तुलसी दास की प्रेरणा से शुरू काशी का ऐतिहासिक नाटी इमली का भरत मिलापकाशी के लक्खा मेले यानी जिस मेले में लाखों लोग पहुंचते हैं उस मेले में शुमार नाटी इमली के भरत मिलाप की तैयारियां पूरी कर ली गई हैं। बुधवार की दोपहर बाद मात्र कुछ मिनट की लीला को देखने के लिए लोगों का हुजूम पहुंचेगा। इसे देखते हुए नाटी इमली मैदान को 15 फ़ीट ऊंची बांस और बल्लियों से घेर दिया गया है।

लंका में रावण पर विजय प्राप्त करने के बाद मर्यादा पुरषोत्तम राम और लक्ष्मण तब भरत और शत्रुघ्न से उनके मिलन को ही भरत मिलाप कहा जाता है। इस मेले की गिनती दुनिया के सबसे पुराने मेलों में भी होती है। लगभग पांच सौ वर्ष पहले संत तुलसीदास जी के शरीर त्यागने के बाद उनके समकालीन संत मेधा भगत काफी विचलित हो उठे। मान्यता है की उन्हें स्वप्न में तुलसीदास जी के दर्शन हुए और उसके बाद उन्ही के प्रेरणा से उन्होंने इस रामलीला की शुरुआत की।

मान्यता ऐसी है की 473 वर्ष पुरानी काशी की इस लीला में भगवान राम स्वयं धरती पर अवतरित होते हैं। कहा ये भी जाता है की तुलसी दास जी ने जब रामचरित मानस को काशी के घाटों पर लिखा उसके बाद तुलसी दास जी ने भी कलाकारों को इकठ्ठा कर लीला यहां शुरू की थी। मगर उसे परम्परा के रूप में मेघा भगत जी ने शुरू किया। मान्यता ये भी है कि मेघा भगत को इसी चबूतरे पर भगवान राम ने दर्शन दिया था तभी से काशी में भरत मिलाप शुरू हुआ।

हाथी पर पहुंचते हैं काशी नरेश, अस्ताचलगामी सूर्य की किरणों में होती है लीला                                                     लीला को देखने के लिए काशी नरेश भी पहुंचते हैं। मान्यता है कि भरत ने संकल्प लिया था, ”यदि आज मुझे सूर्यास्त के पहले श्रीराम के दर्शन नहीं हुए तो प्राण त्याग दूंगा।” इसीलिए यह लीला सूर्यास्त के पहले 4:40 पर होती है। ठीक 4 बजकर 40 मिनट पर जैसे ही अस्ताचलगामी सूर्य की किरणें भरत मिलाप मैदान के एक निश्चित स्थान पर पड़ती हैं तो भगवान राम और लक्ष्मण दौड़ कर भरत और शत्रुघ्न को गले लगाते हैं।

यदुवंशियों के कंधे पर अयोध्या पहुंचता है हज़ारों किलों का रथ                          भरत मिलाप होने के बाद प्रभु श्रीराम, लक्ष्मण, भरत, शत्रुघ्न, माता सीता और वानरी सेना को रथ समेत यदुवंशी नाटी इमली से बड़ा गणेश (अयोध्या) पहुंचाते हैं। हज़ारों किलो वजनी रथ को यदुवंशी अपने कंधे पर लेकर जाते हैं। इस परंपरा को पुण्य मानने वाले यादव समाज के सैकड़ों युवा भी विशेष परिधान और सिर पर साफा बांध कर पहुंचते हैं। हज़ारों किलों के इस रथ को नाटी इमली से बड़ा गणेश तक घुमावदार गलियों से लेकर जाते देखना भी कम रोमांचकारी नहीं होता है। रास्ते भर लोग रथ पर फूलों की वर्षा भी करते रहते हैं।

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